सिनेमा और अध्यात्म के संगम ने कभी सोचा नहीं होगा कि बिना किसी बड़े स्टारकास्ट और तामझाम के बनी फिल्म बॉक्स ऑफिस पर ऐसा तूफ़ान ला देगी। महज़ ₹2 करोड़ के बजट में बनी निर्देशक विशाल चतुर्वेदी की फिल्म ‘हनुमान अंश’ (Hanuman Ansh) ने शुरुआती दिनों में फ्लॉप होने की कगार से उठकर ऐसा करिश्मा दिखाया कि 30 दिनों के भीतर घरेलू बॉक्स ऑफिस पर ₹140 करोड़ से अधिक का नेट और ₹155 करोड़ से ज्यादा का ग्रॉस कलेक्शन पार कर लिया।
फिल्म में बाबा नीम करोरी का किरदार निभाने वाले अभिनेता शोभिनव सत्य (Shobhinaw Satyaa) रातों-रात चर्चा के केंद्र में आ गए। पहले वे फिल्म में सिर्फ एक असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर जुड़े थे, लेकिन मुख्य अभिनेता के ऐन वक्त पर बीमार पड़ने के बाद 5 घंटे के स्क्रीन टेस्ट ने उनकी किस्मत बदल दी। इस फिल्म की अप्रत्याशित सफलता ने पूरी दुनिया का ध्यान एक बार फिर बाबा नीम करोरी के उस गुमनाम और पावन अतीत की ओर खींच लिया है, जिसकी जड़ें उत्तराखंड के कैंची धाम से पहले उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले के ‘नीम करौरी’ गाँव में बसी हैं।
कैंची धाम से पहले: जहाँ बाबा ने बिताए थे 23 साल (1912 से 1935)
आज जब भी बाबा का नाम आता है, तो लोगों के ज़हन में नैनीताल का कैंची धाम या वृंदावन आश्रम कौंधता है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि महाराज जी को ‘नीम करोरी’ नाम जिस जगह से मिला, वह फर्रुखाबाद का यही छोटा सा गाँव है:
- 1912 में आगमन और सांसारिक पहचान: बाबा का मूल नाम पंडित लक्ष्मीनारायण शर्मा था। वे महज़ 11-12 वर्ष की उम्र में सांसारिक मोह त्यागकर 1912 में इस गाँव में पधारे थे।
- 18 से 20 वर्षों का मौन तप: 1912 से लेकर 1935 तक, लगभग दो दशकों से अधिक समय तक बाबा ने इसी गाँव की मिट्टी पर घोर तप और हठयोग साधना की।
- गाँव से मिला नया नाम: इसी गाँव के ग्रामीणों ने बाबा की अगाध तपस्या और सादगी को देखकर उन्हें आदर से ‘बाबा लक्ष्मण दास’ का नाम दिया था।
गोबर-मिट्टी से स्थापित हनुमान जी और जड़ों के नीचे गुप्त गुफा
दैनिक जागरण की ग्राउंड रिपोर्ट के अनुसार, फर्रुखाबाद स्थित इस मूल तपोस्थली पर आज भी वे दो आध्यात्मिक प्रतीक जीवंत हैं, जिनके दर्शन के लिए ‘हनुमान अंश’ की सफलता के बाद भक्तों का तांता लग रहा है:
- हाथों से गढ़े बजरंगबली: मंदिर परिसर में स्थापित हनुमान जी की पावन प्रतिमा को किसी शिल्पी या मशीन ने नहीं तराशा, बल्कि स्वयं बाबा नीम करोरी ने अपने हाथों से गाय के गोबर और स्थानीय पवित्र मिट्टी को मिलाकर इस विग्रह की प्राण-प्रतिष्ठा की थी।
- विशाल वृक्ष और साधना गुफा: परिसर में मौजूद एक प्राचीन विशाल वृक्ष के तने और जड़ों के ठीक नीचे एक भूमिगत गुफा मौजूद है। मान्यता है कि सांसारिक कोलाहल से परे होकर बाबा घंटों इसी शांत कंदरा में बैठकर प्रभु श्रीराम और संकटमोचन हनुमान के ध्यान में लीन रहते थे।
अंग्रेजों के दौर का वो किस्सा: जब हिल नहीं पाई थी ट्रेन
इस तपोस्थली से जुड़ा सबसे विख्यात ऐतिहासिक प्रसंग ब्रिटिश हुकूमत के समय का है:
- उस दौर में नीम करौरी गाँव के पास ट्रेन का कोई हॉल्ट (ठहराव) नहीं था, जिससे स्थानीय ग्रामीणों को दूर-दराज जाने में भारी परेशानी होती थी।
- एक बार बाबा गंगा स्नान के लिए निकले और ट्रेन में सवार हो गए। टिकट न होने पर अंग्रेज टीटीई ने उन्हें इसी नीम करौरी गाँव के बीहड़ इलाके में ट्रेन से नीचे उतार दिया।
- बाबा बिना किसी विरोध के मुस्कुराते हुए रेलवे ट्रैक के किनारे बैठ गए। लेकिन इसके बाद एक अजीब वाकया हुआ—चालक ने पूरा स्टीम दिया, गार्ड ने हरी झंडी दिखाई, मगर ट्रेन का चक्का एक इंच भी आगे नहीं बढ़ा।
- रेलवे अधिकारियों ने तकनीकी खराबी मानकर दूसरा भारी इंजन बुलवाकर लगवाया, परंतु वह भी जाम हो गया।
- जब स्थानीय रेलकर्मियों ने अंग्रेज अफसरों को बताया कि एक सिद्ध साधु को अपमानित करके उतारा गया है, तब अधिकारियों ने बाबा के चरणों में गिरकर क्षमा याचना की।
- बाबा ने सहज भाव से कहा—“गाड़ी तो चल जाएगी, पर इस गाँव के गरीबों के लिए यहाँ स्टेशन बनना चाहिए।” बाबा के पुनः ट्रेन में कदम रखते ही दोनों इंजन सरपट दौड़ पड़े। बाद में ब्रिटिश रेलवे को यहाँ बाकायदा हॉल्ट बनाना पड़ा, जिसे आगे चलकर ‘बाबा लक्ष्मण दास पूरी’ स्टेशन नाम दिया गया।

